शरद पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है – शरद पूर्णिमा की पौराणिक कथा
सनातन धर्म में अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि का विशेष और अत्यंत पवित्र महत्व है। इस तिथि को शरद पूर्णिमा (Sharad Purnima), रास पूर्णिमा, कोजागरी पूर्णिमा (Kojagari Purnima) तथा अमृत पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह रात्रि वर्ष की सबसे सुंदर और ऊर्जावान रात्रियों में से एक मानी जाती है। ज्योतिष शास्त्र और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, संपूर्ण वर्ष में केवल इसी दिन चंद्रमा अपनी 16 कलाओं (16 Kalas) से परिपूर्ण होकर पृथ्वी पर अपनी अमृतमयी किरणों की वर्षा करता है।
इस पावन तिथि पर जगत के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु, धन-वैभव की देवी माता महालक्ष्मी और चंद्रदेव का पूजन करने का विधान है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात्रि में देवी लक्ष्मी स्वर्ग लोक से पृथ्वी पर भ्रमण करने आती हैं और यह देखती हैं कि कौन सा भक्त रात्रि में जागरण कर उनका भजन-कीर्तन कर रहा है। इसी कारण इस पर्व को ‘कोजागरी’ (को जागर्ति – यानी कौन जाग रहा है) भी कहा जाता है।
आइए, इस विस्तृत आलेख में जानते हैं कि शरद पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है, इसकी प्रामाणिक पौराणिक कथा क्या है, चंद्र किरणों से अमृत वर्षा का वैज्ञानिक व आयुर्वेदिक आधार क्या है, तथा इस दिन खीर बनाने का क्या विशेष विधान है।
शरद पूर्णिमा का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व
हिंदू पंचांग के अनुसार, शरद पूर्णिमा से ही शरद ऋतु का औपचारिक आगमन माना जाता है। इस दिन चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है। चंद्रमा की किरणों में विशेष प्रकार की शीतलता, आरोग्य और आध्यात्मिक ऊर्जा विद्यमान होती है।
1. माता महालक्ष्मी का अवतरण दिवस
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब देवों और असुरों द्वारा समुद्र मंथन किया गया था, तब कार्तिक और अश्विन मास के संधिकाल में शरद पूर्णिमा के दिन ही माता लक्ष्मी का क्षीरसागर से प्राकट्य (अवतरण) हुआ था। यही कारण है कि इस दिन लक्ष्मी पूजन का विशेष महत्व है। जो साधक इस रात्रि में निष्ठापूर्वक माता लक्ष्मी की आराधना करते हैं, उनके जीवन से दरिद्रता, आर्थिक संकट और ऋण (कर्ज) का सर्वनाश होता है।
2. भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला
श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, द्वापर युग में शरद पूर्णिमा की ही दिव्य रात्रि को भगवान श्री कृष्ण ने वृंदावन में यमुना तट पर वंशीवट नीचे अपनी गोपियों के साथ ‘महारास’ रचाया था। कहा जाता है कि इस रास लीला को देखने के लिए स्वयं भगवान शिव भी गोपी रूप धारण करके पहुंचे थे। इस दिन भगवान कृष्ण ने अपनी योगमाया से एक रात्रि को ब्रह्मा जी की एक रात के बराबर (हजारों वर्ष) बड़ा कर दिया था। इसलिए इसे ‘रास पूर्णिमा’ भी कहा जाता है।
3. चंद्रदेव की 16 कलाएं
भगवान श्रीकृष्ण को 16 कलाओं का अवतार माना गया है, और शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रदेव भी अपनी समस्त 16 कलाओं से परिपूर्ण होते हैं। यह कलाएं मनुष्य के गुण, बुद्धि, तेज और मानसिक शांति से संबंध रखती हैं। इस दिन चंद्र दर्शन करने से मन का तनाव दूर होता है और ध्यान में गहराई आती है।
शरद पूर्णिमा की प्रामाणिक व्रत कथा (Sharad Purnima Vrat Katha)
शरद पूर्णिमा के व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए पूजा के समय इस प्रामाणिक पौराणिक कथा को सुनना अथवा पढ़ना अनिवार्य माना गया है:
प्राचीन काल में एक नगर में एक धार्मिक और दयालु साहूकार रहता था। साहूकार की दो पुत्रियां थीं। दोनों बेटियां पूर्णिमा का व्रत रखा करती थीं। परंतु, दोनों के व्रत करने के भाव और विधि में बड़ा अंतर था। बड़ी बेटी धार्मिक नियमों का कड़ाई से पालन करती थी और पूर्णिमा का व्रत पूर्ण विधि-विधान, श्रद्धा और नियम के साथ पूरा करती थी। इसके विपरीत, छोटी बेटी आलस्यवश व्रत के नियमों की उपेक्षा करती थी। वह व्रत रखने का संकल्प तो लेती थी, लेकिन उसे अधूरा ही छोड़ देती थी या आधे-अधूरे मन से पूजन करती थी।
समय बीतने पर साहूकार ने अपनी दोनों पुत्रियों का विवाह योग्य वर से कर दिया। बड़ी बेटी ने समय पर एक अत्यंत सुंदर, स्वस्थ और दीर्घायु पुत्र को जन्म दिया। परंतु छोटी बेटी के साथ एक दुखद घटना घटने लगी—उसकी संतान जन्म लेते ही या तो मृत पैदा होती थी या जन्म के कुछ ही समय पश्चात मृत्यु को प्राप्त हो जाती थी। एक-एक करके उसकी कई संतानें अकाल मृत्यु का शिकार हो गईं।
इस भयंकर दुख से व्यथित होकर छोटी बहन ने नगर के एक विद्वान पंडित से अपनी इस दुर्दशा का कारण पूछा। पंडित जी ने अपने ध्यान और ज्योतिष ज्ञान से देखकर बताया, “हे पुत्री! तुमने पूर्व में पूर्णिमा के व्रतों का अनादर किया है। तुम व्रत का संकल्प लेकर उसे अधूरा छोड़ देती थीं। उसी पूर्णिमा व्रत के खंडित होने और अधूरा रहने के दोष के कारण तुम्हारी संतानों की अकाल मृत्यु हो रही है।”
यह सुनकर छोटी बहन अत्यंत पश्चाताप करने लगी और उसने पंडित जी से इसका उपाय पूछा। पंडित जी ने उत्तर दिया, “यदि तुम अश्विन मास की शरद पूर्णिमा का व्रत पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और विधि-विधान के साथ करो और चंद्रदेव व माता लक्ष्मी से अपने अपराधों की क्षमा मांगो, तो तुम्हारा यह दोष समाप्त हो सकता है।”
पंडित जी की सलाह पर उसने शरद पूर्णिमा का निष्ठापूर्वक व्रत रखने का संकल्प लिया। परंतु इसी बीच शरद पूर्णिमा से पूर्व ही उसने पुनः एक पुत्र को जन्म दिया, जो जन्म लेते ही मृत हो गया। इस बार उसने धैर्य नहीं खोया। उसने बालक के मृत शरीर को एक लकड़ी के पीढ़े (चौकी) पर लिटा दिया और उसके ऊपर एक सुंदर चुनरी ढंक दी ताकि किसी की नज़र न पड़े।
इसके बाद उसने अपनी बड़ी बहन को अपने घर बुलाया और उसे बैठने के लिए उसी पीढ़े की ओर संकेत किया। बड़ी बहन जैसे ही उस पीढ़े पर बैठने लगी, उसका घाघरा (वस्त्र) उस मृत बालक के शरीर से स्पर्श हो गया। बड़ी बहन के पुण्य प्रभाव और वस्त्र के स्पर्श होते ही वह मृत बालक तुरंत रोने लगा और जीवित हो उठा!
बड़ी बहन अचानक बालक के रोने की आवाज सुनकर डर गई और क्रोधित होकर बोली, “अरे बहन! तुम यह क्या करने जा रही थीं? यदि मैं इस पर बैठ जाती तो तुम्हारा निर्दोष बालक मेरे भार से दबकर मर जाता और मुझ पर हत्या का पाप लगता!”
तब छोटी बहन ने आंखों में आंसू भरकर विनम्रता से कहा, “नहीं बहन! यह बालक तो पहले से ही मृत था। यह तो आपके पूर्णिमा व्रत के पुण्य और आपके सत्य के प्रभाव से पुनः जीवित हुआ है! आपके स्पर्श मात्र से चंद्रदेव और माता लक्ष्मी ने इसे जीवनदान दे दिया।”
इस चमत्कार के बाद छोटी बहन को पूर्णिमा व्रत की वास्तविक महिमा समझ में आ गई। उसने पूरे नगर में ढिंढोरा पिटवाकर शरद पूर्णिमा व्रत के महात्म्य का प्रचार किया। उसके बाद से नगर की सभी स्त्रियां अपनी संतानों की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए शरद पूर्णिमा का पूर्ण व्रत रखने लगीं।
शरद पूर्णिमा पर खीर का महत्व और औषधीय विज्ञान
शरद पूर्णिमा की रात को खुले आसमान के नीचे गाय के दूध, चावल, मखाने और मेवे से बनी खीर रखने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इसके पीछे धार्मिक के साथ-साथ गहरा वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक रहस्य छिपा हुआ है:
1. धार्मिक एवं पौराणिक मान्यता
मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात्रि में चंद्रमा की किरणों के माध्यम से आकाश से ‘अमृत’ टपकता है। जब खीर को पूरे रात चंद्रमा की चांदनी में रखा जाता है, तो वह खीर उस अमृतमयी किरणों को अवशोषित कर लेती है। अगले दिन प्रातःकाल इस खीर का प्रसाद ग्रहण करने से व्यक्ति आरोग्य रहता है और उस पर भगवान विष्णु व लक्ष्मी जी की असीम कृपा बनी रहती है।
2. वैज्ञानिक एवं आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथ चरक संहिता के अनुसार, शरद ऋतु में मानव शरीर में ‘पित्त दोष’ (Pitta Dosha) का प्रकोप बढ़ जाता है। ग्रीष्म ऋतु के बाद जब शरद ऋतु आती है, तो शरीर में गर्मी एकत्र हो जाती है।
- पित्त का शमन: दूध और चावल से बनी ठंडी खीर शीतलता प्रदान करती है और शरीर के बढ़े हुए पित्त को शांत करती है।
- विटामिन D और पोषक तत्व: चंद्रमा की चांदनी में चांदी के बर्तन में रखी खीर रसायन प्रक्रिया (Chemical Reaction) के माध्यम से विशेष औषधीय गुणों से युक्त हो जाती है। चांदी के बर्तन में एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं।
- नेत्र ज्योति एवं श्वास रोग में लाभ: मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा को लगातार निहारने (त्राटक करने) से आंखों की रोशनी तेज होती है। वहीं चांदनी में रखी खीर का सेवन करने से दमा (Asthma) और श्वास संबंधी रोगों में राहत मिलती है।
शरद पूर्णिमा पूजा विधि (Sharad Purnima Puja Vidhi)
शरद पूर्णिमा का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए पूजा को सही विधि से संपन्न करना आवश्यक है:
- प्रातः स्नान एवं संकल्प: शरद पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर किसी पवित्र नदी में स्नान करें या घर पर ही नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें। इसके पश्चात हाथ में जल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें।
- पूजा स्थल की तैयारी: घर के मंदिर को साफ करें। एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर भगवान सत्यनारायण (श्री हरि विष्णु) और माता महालक्ष्मी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- पूजन प्रक्रिया: भगवान को रोली, मौली, अक्षत, पीले फूल, धूप, दीप और फल अर्पित करें। माता लक्ष्मी को कमल का फूल या लाल गुलाब अवश्य चढ़ाएं।
- कथा श्रवण: श्री सत्यनारायण स्वामी की कथा या शरद पूर्णिमा की पौराणिक कथा का पाठ करें और आरती उतारें।
- रात्रि पूजन एवं खीर बनाना: संध्या के समय गाय के शुद्ध दूध में चावल, मखाने, केसर, इलायची और सूखे मेवे डालकर खीर बनाएं। संभव हो तो खीर को चांदी के पात्र में पकाएं या रखें।
- अमृत वर्षा हेतु खीर रखना: रात्रि 10:00 से 12:00 बजे के बीच जब चंद्रमा पूर्ण रूप से उदित हो जाए, तब इस खीर को किसी बारीक कपड़े या छलनी से ढंककर खुले आसमान या छत पर ऐसी जगह रखें जहां चंद्रमा की सीधी रोशनी उस पर पड़े।
- चंद्र अर्घ्य: चंद्रदेव को चांदी के लोटे में जल, दूध, रोली और अक्षत मिलाकर अर्घ्य दें तथा “ॐ सोमाय नमः” अथवा “ॐ चं चंद्रमसे नमः” मंत्र का जाप करें।
- प्रसाद वितरण: अगले दिन ब्रह्म मुहूर्त में प्रातः स्नान के बाद चंद्रमा के साए में रखी खीर का भोग भगवान को लगाएं और स्वयं तथा परिवार के सदस्यों में प्रसाद के रूप में बांटें।
कोजागरी लक्ष्मी पूजा और ‘को जागर्ति’ का रहस्य
पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, असम और महाराष्ट्र में शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा के रूप में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। संस्कृत भाषा में ‘को जागर्ति’ का अर्थ होता है—”कौन जाग रहा है?”
ऐसी मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की मध्यरात्रि में देवी महालक्ष्मी अपने वाहन उल्लू पर सवार होकर पृथ्वी लोक पर आती हैं। वह घर-घर जाकर देखती हैं कि कौन सा भक्त रात्रि में सो नहीं रहा है, बल्कि ईश्वर के ध्यान और भजन में लीन है। जो भक्त रात्रि में जगकर माता का ध्यान करते हैं, माता उनके घर में स्थाई रूप से निवास करती हैं और उन्हें धन-धान्य से परिपूर्ण कर देती हैं।
इसके विपरीत, जो लोग इस पावन रात्रि को आलस्य के कारण सोकर बिता देते हैं या घर में अंधेरा रखते हैं, वहां से माता लक्ष्मी विमुख होकर लौट जाती हैं। इसलिए इस दिन रात्रि जागरण (Night Vigil) का विशेष विधान है।
शरद पूर्णिमा पर क्या करें और क्या न करें
क्या करें (Dos):
- घर के मुख्य द्वार पर सात्विक रंगोली बनाएं और दीपक जलाएं।
- चंद्रमा की रोशनी में कम से कम 15 से 20 मिनट बिताएं या ध्यान (Meditation) करें।
- गाय के दूध से बनी खीर का ही भोग लगाएं।
- जरूरतमंदों, ब्राह्मणों और कन्याओं को अन्न, वस्त्र व खीर का दान करें।
- कनकधारा स्तोत्र, श्री सूक्त या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। अधिक जानकारी के लिए Ekadashi.org पर अन्य धार्मिक लेख पढ़ें।
क्या न करें (Don’ts):
- इस दिन तामसिक भोजन (मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज) का सेवन भूलकर भी न करें।
- घर में अंधेरा न रखें; विशेषकर मुख्य द्वार और पूजा स्थल पर दीपक जलता रहना चाहिए।
- किसी का अनादर न करें और क्रोध व विवाद से बचें।
- शरद पूर्णिमा की रात को बहुत देर तक सोने से बचें; भजन-कीर्तन में समय बिताएं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्र.1: शरद पूर्णिमा की रात को खीर छत पर क्यों रखी जाती है?
उत्तर: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा से अमृत वर्षा होती है। खीर को छत पर रखने से वह चंद्रमा की किरणों से उस अमृतमयी ऊर्जा को अवशोषित कर लेती है, जिससे वह खीर औषधीय और आध्यात्मिक रूप से अत्यंत लाभकारी हो जाती है।
प्र.2: क्या शरद पूर्णिमा की खीर को अगले दिन खाना चाहिए?
उत्तर: हां, शरद पूर्णिमा की रात भर चंद्रमा की रोशनी में रखी खीर को अगले दिन सुबह भगवान को भोग लगाने के पश्चात ही प्रसाद के रूप में ग्रहण करना चाहिए।
प्र.3: शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा क्यों कहते हैं?
उत्तर: ‘कोजागरी’ शब्द ‘को जागर्ति’ से बना है जिसका अर्थ है “कौन जाग रहा है?” माना जाता है कि इस रात माता लक्ष्मी पृथ्वी पर आकर देखती हैं कि कौन जागकर उनका पूजन कर रहा है, इसलिए इसे कोजागरी पूर्णिमा कहते हैं।
प्र.4: शरद पूर्णिमा के दिन किस मंत्र का जाप करना चाहिए?
उत्तर: शरद पूर्णिमा के दिन माता लक्ष्मी के मंत्र “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः” और चंद्र मंत्र “ॐ सोमाय नमः” का जाप करना अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है।
प्र.5: क्या गर्भवती महिलाओं को शरद पूर्णिमा की चांदनी में बैठना चाहिए?
उत्तर: हां, धार्मिक और स्वास्थ्य की दृष्टि से शरद पूर्णिमा की शांत व सकारात्मक चंद्र किरणें गर्भास्थ शिशु और माता दोनों के मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य के लिए शुभ मानी जाती हैं।
